Tuesday, April 28, 2015

जंगल में खो गया हूँ मैं !










   जंगल में खो गया हूँ मैं !
   --------------------------

    भीड़ ही भीड़ है ,
    इस भीड़ में कहाँ हूँ मैं ?

    राह दिखती नहीं ,
    जंगल है एक मनुष्यों का ,
    सच कहूँ तो इसी 
    जंगल में खो गया हूँ मैं  !

    एक आवाज़ भी 
    लगती नहीं पहचानी ,
    क्या पता कौन - सा 
    ये देता इम्तिहाँ हूँ मैं ?

    एक मुद्दत हुई 
    सपना नहीं आया कोई ,
    साँस के इस सफ़र से 
    इस क़दर हैराँ हूँ मैं !

    आपका रहमो -करम 
    रक्खे है ज़िन्दा मुझको ,
    वरना लगता रहा ज्यों 
    मौत के दरम्याँ हूँ मैं !

                  - श्रीकृष्ण शर्मा 

____________________

पुस्तक - '' एक नदी कोलाहल "  ,  पृष्ठ - 55












sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

No comments:

Post a Comment