Saturday, April 11, 2015

बादल तो आये










बादल तो आये
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बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये । 

सात - सात दिन तक सावन में 
मेघिल झर झरना ,
सच पूछो तो हुआ आज की 
पीढ़ी को सपना ;
क़त्लेआम वनों का कर , लगता हम छले गये । 
बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये । । 

बिगड़ा मौसम का मिजाज़ ,
गरमाये सूरज जी ,
हावी होती हरीतिमा पर ,
मरुथल की मरज़ी ,
ज़हर - बुझी है हवा , कान पेड़ों के मले गये । 
बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये । । 

कंकरीट के जंगल उगकर 
होने लगे घने ,
अन्धे - तंग गली - कूँचे सब 
गन्दे , कीच - सने ;
पाश धूप के तन में धुन्ध - धुएँ के डले गये । 
बादल तो आये , पर बिन बरसे ही  चले गये । । 

देहरी को लीप कर सवेरे 
रंगोली रचना ,
उत्सव पर मेंहदी व महावर 
गीत - नाद - हँसना ;
भाषा - भूषा - संस्कृति के सब गौरव दले गये । 
बादल तो आये , पर बिन बरसे  ही चले गये । । 

बाल बिखेरे धूल घुड़चढ़ी 
अम्बर में करती ,
शोकगीत लिखती हर तितली 
तिल - तिल कर मरती ;
शोर बन गया जालिम इतना , सब पग तले गये । 
बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये । । 

आतंकित है आज प्रकृति 
बढ़ रहे प्रदूषण से ,
पर्यावरण मिट रहा है 
पगलाये दूषण से ;
नाश देखता , मनुज मरण - पथ में बढ़ भले गये । 
बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये । । 

                                             - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' एक नदी कोलाहल ''  ,  पृष्ठ - 31 , 32

   





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shrikrishnasharma.wordpress.com


2 comments:

  1. लोहड़ी की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवार (13-04-2015) को "विश्व युवा लेखक प्रोत्साहन दिवस" {चर्चा - 1946} पर भी होगी!
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    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. धन्यवाद मयंक जी |

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