Thursday, December 31, 2015

नव वर्ष की शुभ कामनाएँ एवं ''अतीत का गर्व '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -





''अतीत का गर्व '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - चाँद झील में '' से लिया गया है -




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सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
पिन कोड – 326512
फोन नम्बर - 9414771867

Wednesday, December 30, 2015

'' समझे अगर न '' नामक मुक्तक , स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -


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Tuesday, December 29, 2015

''जल का मूल्य '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Monday, December 28, 2015

'' अभिमन्यु की हत्या '' नामक नवगीत , स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









           छेद कर 
           जैसे कलेजे में 
           गगन के कील ,
           हत्यारे - सरीखा है खड़ा
           दुर्दम्य - ऊँचा ताड़ ,
           बौने पेड़ ठठ के - ठठ
           अवश - निरुपाय ।     

जैसे -
द्रौपदी कौरव - सभा में 
लाज को रोती ,
दुःशासन पाशविकता में लगाता कहकहे ,
सहमा हुआ स्वर सुन नहीं पड़ता 
निरर्थक शोर में । 
           आसनों धृतराष्ट्र की औलाद 
           बैठी भोगतीं सुख और सुविधा 
           पाण्डवों का हक़ । 

और 
रच दुष्चक्र ,
जन - जन को रुपहली जिन्दगी से काट 
निर्वासन - अवधि को काटने 
भेजा किसी अज्ञात पथ पर । 
           और 
           महँगाई - अभावों का बना कर व्यूह ,
           मार डाला 
           चेतनायुत - ऊर्जस्वित अभिमन्यु । 


                                   - श्रीकृष्ण शर्मा 

_________________________
पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 62 , 63

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Sunday, December 27, 2015

'' मानुषी धर्म '' नामक मुक्तक , स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Saturday, December 26, 2015

'' खोया है बचपन '' नामक मुक्तक , कवि श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -





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Friday, December 25, 2015

'' मन में साँप '' नामक बरवै , कवि श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









पीड़ा ही पीड़ा से पूरित धाम । 
कैसे मिल पायेगा , सुख हे राम ?

            जीवन की यह सन्ध्या , फूले काश । 
            सिन्दूरी हो जाये , सब आकाश । । 

मुश्किल से जोड़ा जो , काठ - कवार । 
छाती पर लादोगे , कब तक भार ?

            जीवन एक पहेली , दुश्वार । 
            सहज - सहज जो बुझैँ , उतरें पार । । 

पूर्व जन्म के ऋण का , भारी बोझ । 
चुका रहे हम जिसको मर कर रोज़ । । 

            मायावी नगरी का कौन मुकाम ?
            गड्डमड्ड सब चेहरे , सुधि औ ' नाम । । 

डूब रहीं संज्ञाएँ , तम के ज्वार । 
उजियारा देता हर रूपाकार । । 

            सौ सुख ने बिसराया , जलता जेठ । 
            पर  असह्य है दुख की , एक चपेट । । 

धन के पीछे पागल , जग बेहाल । 
जठर माँगता केवल रोटी - दाल । । 

            प्यार लिये सौ खुशबू , सारे रंग । 
            प्यार बिना जग सूना औ ' बेरंग । । 

भले अकेले या हो कोई साथ । 
घेरे खड़ी हुई है सुधि दिन - रात । । 

            दिन के घर में तम के फैले पाँव । 
            बदली से आशीषित सारा गाँव । । 

निर्धनता गाली है , है ये शाप । 
केन्द्रित एक बिन्दु पर , ज्यों सब ताप । । 

            आज सभी के मन में बैठा साँप । 
            प्रगट किसी का , कोई रखता ढाँप । । 

खड़ी ' यार्ड ' में ही है , हो निरुपाय । 
माथे की वह बिन्दी , ' हिन्दी ' हाय !!


                      - श्रीकृष्ण शर्मा 
______________________
पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 99 , 100

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पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
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Thursday, December 24, 2015

'' खड़े हैं बौने शिखर पर '' नामक नवगीत , स्व, श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









          हम अजित , पर जन्म से ही 
          पराजय का शाप ढोते ,
          पुत्र सूरज के , घिरे हम , अन्ध तम - घन !

क्या न हम थे साहसी 
या किसी कौशल में कमी थी ?
जब कि केन्द्रित लक्ष्य पर ही 
दृस्टि ये अपनी जमी थी ;
          किन्तु क्या चक्कर चला जो 
          देखते ही रह गए हम ,
         औन - पौनों  को मिला वह लक्ष्य - भेदन !
                      हम अजित , पर जन्म से ही..... 

बुद्धि , प्रतिभा , श्रम , सभी में 
आज भी हम श्रेष्ठतम हैं ,
ज़िन्दगी की दौड़ में पर 
आज अपना अन्त्य क्रम है ;
          खड़े हैं बौने शिखर पर 
         और हम हैं तलहटी में ,
         जंगलों के बीच बनते सिर्फ ईंधन !
                    हम अजित , पर जन्म से ही..... 

कहें अपनी बदनसीबी 
या समय का फेर  कह दें ,
ले कवच - कुण्डल हमारे ,
हमारे ही हमें शह दें ;
          और ऐसे में धुनें सिर 
          या कि कोसें मूर्खता को ,
          पढ़ रहे खुद के लिए खुद मंत्र मारन !
                    हम अजित , पर जन्म से ही..... 

धूत वह , वह लाखघर , वन....    
- वास यह , ये मंत्रणाएँ ;
सिर्फ़ धोखे और छल की 
रूप लेती मंत्रणाएँ ;
         देखते सब , जानते सब ,
        सब्र करके सह रहे पर 
                   अग्निवर्णी नयन में है तड़ित - तर्जन !

        हम अजित , पर जन्म से ही 
        पराजय का शाप ढोते ,
       पुत्र सूरज के , घिरे हम , अन्ध तम - घन !


                                           - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 75 , 76

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Wednesday, December 23, 2015

'' रातों की खाई '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Tuesday, December 22, 2015

'' सपना कोई '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -


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Monday, December 21, 2015

'' रस - वृक्ष '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









         बैठो तो तनिक पास !!

गुज़र रहे पल यों ही ,
कर लें हम इन्हें ख़ास !
बैठो तो तनिक पास !!

नौंन - तेल - लकड़ी के 
माया - वन में उलझे ,
ज्ञात नहीं रूप - रंग -
रस के कब वृक्ष सजे ,
         अब तो सब जल - जल कर ,
         हैं बुझे - बुझे पलास !

बच्चों के हित रीती 
जीवन की सब केसर ,
पिघल गया सोना सब 
काया का भर - दुपहर ,
         एकान्तों रहा सदा 
         चिन्ताओं का निवास !

जिजीविषा के कारण 
मन अब भी राग लिये ,
रो - रो कर रोज़ हँसे ,
मर - मर कर रोज़ जिये ,
         ऐसे ही अमृत - क्षण ,
         छीज चले साँस - साँस !

रिश्ते हम बंजर से 
कब तलक निभायेंगे ?
इस उजाड़ ऊसर में 
असमय खो जायेंगे ?
         लिये हुए आँसू , ग़म ,
         सपने टूटे - उदास !

इतनी फुरसत न मिली 
कुछ पल अपने होते ,
कुछ कहते , कुछ सुनते ,
इन्द्रधनुष कुछ बोते ,
         बन जाते सावन औ '
         फागुन हम पुनः काश !
         बैठो तो तनिक पास !!

गुज़र रहे पल यों ही ,
कर लें हम इन्हें ख़ास !
बैठो तो तनिक पास !!


                      - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 49 , 50

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Sunday, December 20, 2015

'' छद्म उदारीकरण '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Saturday, December 19, 2015

'' बन नहीं पाये शहर के '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









         हम शहर के हैं ,
         मगर हम 
         बन नहीं पाये शहर के । 

शहर में जन्मे ,
शहर में पले हैं हम 
औ ' बढ़े हैं 
किन्तु अब दिखते न 
पहले की तरह से 
दिल बड़े हैं ,
         जब कि 
         गैरों को समझते लोग 
         अपने गाँव - घर के । 

मन हमारा 
बर्फ जैसा सर्द 
अब तक हो न पाया ,
पत्थरों के इस शहर में 
आँसुओं को बो न पाया ,
         दर्द किसका कौन देखे ,
         आईने सब यहाँ दरके । 

फाड़ते 
आकाश का दिल ,
प्रेत - जैसे भवन ऊँचे ,
भीड़ के सैलाब में 
डूबीं सड़क औ ' गली - कूँचे ,
         धुँआ साँसों ,
         शोर से बेदम बदन 
         हो चले स्वर के । 

ज्ञान औ ' विज्ञान की 
काया बनी ,
माया शहर की ,
स्वार्थ , छल , बल ,
अर्थ - केन्द्रित ,
हर जगह गाथा जहर की ,
         व्यक्ति की पहचान ग़ुम ,
         घेरे अकेलापन पसर के । 

नित - नयी अफवाह उड़ती ,
उलट बहती हैं हवाएँ ,
है न सूत - कपास ,
पर 
सब ही यहाँ डंडे घुमाएँ ,
यंत्र जैसी ज़िन्दगी ही 
         साथ में है ,
         हर बसर के । 

है समय विपरीत ,
लेकिन 
मुश्किलें सब ओढनी हैं ,
ज़िन्दगी की टूटती लय ,
हर तरह से जोड़नी है ,
         घाव के 
         मरहम बनें हम ,
         अग्नि - सर की हर लहर के । 


                          - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 51 , 52 , 53

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Friday, December 18, 2015

'' जीवन का अर्थ '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Thursday, December 17, 2015

'' दुख की दुपहरिया में '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Wednesday, December 16, 2015

'' नाच रहीं मादल पर सुधियाँ '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









             गुनगुना रही मन में ,
         पीड़ा मीरासिन । 
         नाँच रहीं मादल पर ,
         सुधियाँ संथालिन । 

बैठी है सम्मुख 
उदासी पहाड़िन - सी ,
इच्छाएँ सबकी सब 
बिखरी रेबाड़िन - सी ,
         किन्तु तैर रही होठों ,
         हँसी आदिवासिन । 
         नाँच रहीं मादल पर ....

सान चढ़ी छुरी लिये 
तनहाई बिल्लोचिन ,
बींधती है सुइयों से 
रात भर अघोरिन ,

         देख अकेला मुझको ,
         खायेगी डाकिन । 
         नाँच रहीं मादल पर ,
         सुधियाँ संथालिन । 
         गुनगुना रही मन में ,
         पीड़ा मीरासिन । 


                                  - श्रीकृष्ण शर्मा 

_______________________
पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 37 , 38

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पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
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Tuesday, December 15, 2015

'' ये बदरा '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









ये बदरा !
अटका रह गया 
किसी नागफनी काँटे में ,
बिजुरी का ज्यों अँचरा !
        ये बदरा !!

जल की चल झीलें ये ,
उड़ती हैं चीलों सी ,
झर - झर - झर झरती हैं 
जलफुहियाँ खीलों - सी ,
       पानी की सतह - सतह 
      बूँद के बतासे ये ,
      फैंक दिये मेघों ने 
      खिसिया कर पाँसे ये  
पीपल जो बेहद खुश 
था अपनी बाजी पर ,
उसके ही सिर पर अब 
गाज गिरी है अररा !
       ये बदरा !!

व्योम के ढलानों पर 
बरखा के बेटे ये ,
दौड़ - दौड़ हार गये ,
हार - हार बैठे ये ,
      लेटे  - अधलेटे ये 
      नक्षत्री नैन मूँदे 
      चन्दा के अँजुरी भर 
      स्वप्न सँजो बूँद - बूँद ,
अर्पित हो बिखर गये 
भावुक समर्पण में 
टूट गया जादू औ ''
टोनों का हर पहरा !
       ये बदरा !!

बिना रीढ़ वाले ये 
जामुनी अँधेरे - से ,
आर - पार घिरे हुए 
सम्भ्रम के घेरे - से ,
       धरती की साँसों की 
       गुँजलक में बँधे हुए ,
       आते है सागर की 
       सुधियों से लदे - फँदे ,
आँखों में अंकित हैं 
काया के इन्द्रधनुष ,
प्राणों में बीते का 
सम्मोहन है गहरा !
       ये बदरा !!

ये बदरा !
अटका रह गया 
किसी नागफनी काँटे में ,
बिजुरी का ज्यों अँचरा !
      ये बदरा !!


                               - श्रीकृष्ण शर्मा 
_______________________
पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 26 , 27 , 28

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Monday, December 14, 2015

'' चले गये तुम '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Sunday, December 13, 2015

'' तुम घिरे स्नेह से रहो ! '' नामक मुक्तक कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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'' तुम मिले ! '' नामक मुक्तक कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -




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Monday, December 7, 2015

'' सच मानो ! '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Sunday, December 6, 2015

'' आजमाओ मत '' नामक मुक्तक , कवि स्व, श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील से लिया गया है -



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Saturday, December 5, 2015

'' सृजन के तेवरों को देख कर '' नामक नवगीत , कवि स्व, श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









                दिशा अपनी बदल कर आज इस मैदान में आयीं ,
                सृजन के तेवरों को देखकर सहमी हवाएँ !
बहुत सूरज जला था औ ' तपी थी खूब यह धरती ,
बहुत ही सिन्धु खौला था , गगन में बदलियाँ छायीं ,
मगर जाने कहाँ जाकर उन्होंने घट किया खाली ,
कि प्यासी भूमि के हिस्से न मधु की बूँद तक आयी ,
                कि पाया तृप्ति का आशीष लेकिन मरुथलों ने जब ,
                बरसने को उमड़ कर आ रहीं बहकी घटाएँ !
                दिशा अपनी बदल कर आज इस मैदान में आयीं ,
                सृजन के तेवरों को देखकर सहमी हवाएँ !

युगों से पाण्डवों की भाँति निर्वासित रहे सुख से ,
भटकते पेट की खातिर रहे गुमनाम बस्ती में ,
दहक कर बुझ गये जिनके सुलगते स्वप्न तारों - से ,
किन्हीं चिमनी - घरों के धूम्र की रंगीन मस्ती में ,
                उन्हीं द्वारों रुपहली चन्द्र किरणों की रुकी डोली ,
                उजाले से भरी हैं आज फिर अन्धी गुफ़ाएँ !
                दिशा अपनी बदल कर आज इस मैदान में आयीं ,
                सृजन के तेवरों को देखकर सहमी हवाएँ !

पहुँच तो थी न , फिर भी डगमगाते पाँव चलती थी ,
गरीबी इन्द्रधनुषों से बुनी वह चूनरी पाने ,
बनाया था सितारों का महल जिसने वही मेहनत ,
तरसती ही रही थी चाँद वाली मूँदरी पाने ,
                कि जो कमजोर कन्धों पर पहाड़ों को उठाये हैं ,
                उन्हीं के ऊर्जस्वित व्यक्तित्व पर अर्पित ऋचाएँ !
                दिशा अपनी बदल कर आज इस मैदान में आयीं ,
                सृजन के तेवरों को देखकर सहमी हवाएँ !

                                         *                              


                                                        - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 46 , 47

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सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
पिन कोड – 326512
फोन नम्बर - 9414771867

                                                       


Friday, December 4, 2015

'' भूल '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Thursday, December 3, 2015

'' दर्द '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Wednesday, December 2, 2015

'' बहुत मन है '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Tuesday, December 1, 2015

'' सन्दर्भ से कटकर '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









सारे सन्दर्भों से कटे हुए ,
तन में औ ' मन में ही बँटे हुए ,
          कैसे जन्मायेंगे 
          जीवन्ती योजना ?

अर्थ नहीं सपनों की भीड़ों का ,
आँगन में देवदारु - चीड़ों का ,
          व्यर्थ के प्रसंगों पर 
          आँख को निचोड़ना । 

बिकता है विज्ञापन , चीज़ नहीं ,
सभ्य व्यक्त करते हैं , खीज नहीं ,
          अलगावों में ज्यों 
          सम्बन्धों को खोजना । 
                      *
                      
                        - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 35

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Monday, November 30, 2015

'' प्रेम बग़ैर '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Sunday, November 29, 2015

'' दिल वाले '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -




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Saturday, November 28, 2015

'' धूम - धुआँरे वर्तमान में '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









        चले आ रहे 
        घोड़े दौड़े ,
        जैसे रेसकोर्स हो अम्बर । 
हवा गुदगुदाती आ - आकर 
अलसायी  पोखरिया सिहरी ,
कदमताल कर रहीं ताल में 
लहरें होकर दुहरी - तिहरी ,
        फिसल - फिसल 
        हिमखण्ड आ रहे ,
        लिये हुए सर , सरि या सागर । 

बरखा ने कंघी - चोटी कर 
फैंक दिया गुच्छा बालों का ,
उसे लिये जाता हाथों में 
वह शैतान हवा का झोंका ,
        दृश्य देख 
        गुनगुना उठे हैं ,
        रोमांचित हो जोगी तरुवर । 

नदिया की मांसल बाँहों में 
बाँध कर रेत पिघल कर खोया ,
मेघ परी ने अर्पित कर सब 
ऊसर मध्य हरापन बोया ,
        धूम - धुँआरे 
        वर्तमान में ,
        इन्द्रधनुष के स्वर्णिम अक्षर । 


                             - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 24 , 25

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Friday, November 27, 2015

'' सम्बन्ध '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक - संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Thursday, November 26, 2015

'' प्यार के शैदाई '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -




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Wednesday, November 25, 2015

'' तुमने देखा ! '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक - संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Tuesday, November 24, 2015

'' झील रात की ''नामक नवगीत , कवि श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









साँझ - सुबह के मध्य अवस्थित झील रात की ,
भरी हुई है अँधियारे से । 

नीली - नीली लहर नींद की उठतीं - गिरतीं ,
अवचेतन मन की कितनी ही नावें तिरतीं ,
कुण्ठाओं के कमल खिले हैं 
सपनों - जैसे । 
          साँझ - सुबह के मध्य अवस्थित झील रात की ,
          भरी हुई है अँधियारे से । 

इसी झील के तट पर पेड़ गगन है वट का ,
काला बादल चमगादड़ - सा उल्टा लटका ,
शंख - सीप नक्षत्र रेत में 
हैं पारे - से । 
          साँझ - सुबह के मध्य अवस्थित झील रात की ,
          भरी हुई है अँधियारे से ।   

नंगी नहा रहीं प्रकाश की लाख बेटियाँ ,
तट पर बैठीं बाथरूम - गायिका झिल्लियाँ ,
खग चीखे -
वह डूब रहा है चाँद ,
बचा लो 
गहरे में से । 
          साँझ - सुबह के मध्य अवस्थित झील रात की ,
          भरी हुई है अँधियारे से ।     


                                                    - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ -22 , 23 

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Monday, November 23, 2015

'' ख़त '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









हर ख़त 
जैसे -
दुख का रथ । 

      आँसू 
      हँसती आँखों में ,
      पीड़ा लिये 
      ठहाकों में ,
कम्पित होंठ 
गीत की गत । 
हर ख़त … 

      लकवा मारा 
      सपनों को ,
      तेरहवीं क्या 
      दफ्नों को ,
लेकिन 
इति ही 
अब तो अथ । 
हर ख़त …
                 

                - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ -  41

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Sunday, November 22, 2015

'' रसीले '' नामक मुक्तक , स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक - संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Saturday, November 21, 2015

'' तम में कोई नरभक्षी है '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -

          यह सूरज है ,
          चित्र - फ़लक तक । 
पेड़ गये 
भीतर बँगलों में ,
सिर्फ़ प्रदूषण है 
कत्लों में । 
          यह है आग 
          कि जिससे बचना ,
          मुश्किल है अब 
उच्च फ़लक तक ।
यह सूरज है … 

शहर नहीं ,
केवल राहें हैं  ,
धुआँ  - धुन्ध है ,
अफवाहें हैं ,
          तम में 
          कोई नरभक्षी है ,
          घूर रहा 
जो हमको अपलक । 
यह सूरज है… 

सुन्दरता 
केवल फरेब है ,
मन बाँधे जो 
पायजेब है ,
         सब डूबे 
         उसके सम्मोहन ,
अपनी खुशियाँ 
सिर्फ़ ललक तक । 

          यह सूरज है ,
          चित्र - फ़लक तक । 


                               - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 20 , 21

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Friday, November 20, 2015

'' आकाश चकित '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक - संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -



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Thursday, November 19, 2015

'' साँस बुढ़ाई है '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक - संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -





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Wednesday, November 18, 2015



'' आवागमन '' नामक मुक्तक  , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक  - संग्रह - '' चाँद झील में '' से लिया गया है -
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Tuesday, November 17, 2015

'' अँधेरे में हम '' नामक नवगीत , स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









सच है , आज अँधेरे में हम !!

रचा कभी उजियारा हमने ,
आज मावसी घेरे में हम !
सच है , आज अँधेरे में हम !!

            जुगनू अब अम्बर हथियाये ,
            अंधों ने सूरज लतियाये ,
            बौने शीर्ष शिखर कब्जाये ,

            किन्तु जीत कर भी हम हारे ,
            उफ़ , गूँगों  - बहरों के द्वारे ,

इस दुनियावी खेरे में हम !
सच है , आज अँधेरे में हम !!


                               - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 19

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Monday, November 16, 2015

'' धूप छिपी '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









मेघों से डर कर ,
धूप छिपी । 

चन्द्रमा 
दिख रहा है 
कुछ - कुछ ,
         रेत में ,
         अधढँकी पड़ीं सिपी । 
         मेघों से डर कर ,
         धूप छिपी । 

लगता 
घर है 
उराँव का ये ,
         अँगनई सभी है ,
         राख लिपी । 

मेघों से डर कर ,
धूप छिपी ।  


                        - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ -18

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Sunday, November 15, 2015

'' सन्ध्या - दो '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









         सन्ध्या के संग मिटा ,
         सूरज का स्वर्ण - लेख । 

डूब गयी सबकी सब 
बस्ती काले जल में ,
उलझा रह गया शिखर 
मन्दिर का बादल में । 
         यात्राएँ ठहर गयीं 
         सड़कें अधरंग देख । 

नीड़ों में सोयी है 
अब थकान दिन भर की ,
जाग रहा सिर्फ दिया 
आस सँजो घर भर की । 
         सन्नाटा बजता है ,
         रातों की लिये टेक । 

धरती का उजियारा 
हथियाया तारों ने ,
गठियाये सपने सब 
धूर्त औ  ' लबारों ने ,
         उफ़ , पिशाच - सीनों में ,
         गड़ी नहीं किरन - मेख ।  


                                  - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 17

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