Saturday, February 28, 2015

ज़िन्दगी

      ज़िन्दगी
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       ज़िन्दगी ऐसी कि जैसे हो कोई मैला बिछौना ,
       या कि चूल्हे पर चढ़ा जैसे कोई फूटा भगौना ;
       या किसी ने भीड़ वाले और चलते रास्ते पर -
       चाट कर जैसे दिया हो फैंक कोई व्यर्थ दौना । 

                      ज़िन्दगी ऐसी कि जैसे डबडबाती आँख कोई ,
                      धूल से जैसे अँटी हो बन्द घर की ताख कोई ;
                      या किसी मजदूर - बस्ती के धुँए में झींकती -सी -
                      रोशनी को ज्यों दबोचे हो  अँधेरा पाख कोई । 

       ज़िन्दगी ऐसी कि जैसे गाँव कोई पत्थरों का ,
       या अजूबों के शहर में हो मोहल्ला सिरफिरों का ;
       या कि  आदमख़ोर जत्थों से निहत्था जूझता ये -
       जंगलों से जा रहा जो काफ़िला कुछ अक्षरों का । 

                                                                            - श्रीकृष्ण शर्मा 

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     ( रचनाकाल - 1963 )  ,  पुस्तक - '' फागुन के हस्ताक्षर ''  ,  पृष्ठ - 66


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10 comments:

  1. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-03-2015) को "बदलनी होगी सोच..." (चर्चा अंक-1905) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. धन्यवाद मयंक जी |

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  3. जिंदगी के अनेक पहलुओं को बाखूबी लिखा है ...

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  4. अभावों का सून्दर भाव

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  5. बहुत ही सुंदर भावों सजी रचना।

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