Thursday, March 12, 2015

कहाँ अब वह गुलाबी भोर ?

     कहाँ अब वह गुलाबी भोर ?
     -----------------------------

       है कहाँ अब वह गुलाबी भोर ?
       बस पसरी हुई है धूप की ही देह नारंगी । 

       फरसों के झुओं के बाल बिखरे हैं हवा में ,
       हवा में इस नदी के अंग सिहरे हैं ,
       लहर पर चढ़ गयीं लहरें बड़ी ही सहजता से ,
       बड़ी ही सहजता से 
       ये फसल के हाथ में 
       जैसे थमा कर आ गयीं कंघी । 

                   है कहाँ अब वह गुलाबी भोर ?
                   बस पसरी हुई है धूप की ही देह नारंगी । 
                   सुबह की शाख पर थे गुलमोहर फूटे यहाँ जो ,
                   यहाँ जो धूप - छापे तिमिर में छूटे ,
                   क्षितिज के पृष्ठ पर सम्भावना की जो इबारत ,
                   इबारत ख़ुशख़ती से 
                   जो की सूरज ने लिखी ,
                   दिखती नहीं है , आँख है नंगी । 

       है कहीं अब वह गुलाबी भोर ?
       बस पसरी हुई है धूप की ही देह नारंगी । 

                                                                    - श्रीकृष्ण शर्मा 

----------------------------------------------
( रचनाकाल - 1965 )  ,  पुस्तक - '' फागुन के हस्ताक्षर ''  ,  पृष्ठ - 81












sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (16-03-2015) को "जाड़ा कब तक है..." (चर्चा अंक - 1919) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. धन्यवाद मयंक जी |

    ReplyDelete