Saturday, January 30, 2016

'' जिनको भेजा '' नामक नवगीत , स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -









           जिनको भेजा 
           दर्द कहेंगे ,
           वे सब जा बैठे महलों में। 

अपने बीच 
रहे खोली में ,
फ़ाके थे केवल झोली में ,
बातों में 
वे कान कतरते ,
काने थे अन्धी टोली में ,
           बड़े - बड़ों के आगे - पीछे 
           रहते सेवा में ,
           टहलों में। 

बदल गया रँग 
खरबूजे सा ,
खरबूजों को देख - देखकर ,
सीख गये वे 
बिना पंख के उड़ना ,
           जैसे उड़े कबूतर ,
           दुग्गी से बढ़कर होती है ,
           अब उनकी गिनती दहलों में। 

बिछी जाजमों 
गादी बैठे ,
सुख - सुविधा पाँवों के नीचे ,
कौन मर रहा ,
कौन जी रहा ,
फ़िक्र न सबसे आँखें मींचे ,
           चालाकी , साज़िश , बेशर्मी ,
           उनकी चालों में ,
           पहलों में। 


                          - श्रीकृष्ण शर्मा 

( कृपया इसे पढ़ कर अपने विचार अवश्य लिखें | आपके विचारों का स्वागत है | धन्यवाद | )
_____________________
पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 69 , 70

sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

सुनील कुमार शर्मा 
पी . जी . टी . ( इतिहास ) 
पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
पिन कोड – 326512
फोन नम्बर - 9414771867

4 comments:

  1. सामयिक परिदृश्य को इंगित करती सार्थक प्रस्तुति ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-02-2016) को "छद्म आधुनिकता" (चर्चा अंक-2239) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. धन्यवाद कविता जी एवं मयंक जी |

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  4. धन्यवाद कविता जी एवं मयंक जी |

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