Saturday, February 27, 2016

'' मेरे स्वप्न अहम् हारे '' नामक नवगीत , स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है -









हरसिंगार सबके सब मुरझाते चले गये !!
समय के धुँधलके में -
ममता के चेहरे सब धुँधलाते चले गये 
हरसिंगार सबके सब मुरझाते चले गये !!
          देहरी से बाहर 
          उस मधुऋतु के आने की 
          छाया - भर छूट गयी ,
                  मन में ही घुट - घुट कर 
                  सुख की दो - चार बची 
                  साँसें भी टूट गयीं ,
और अन्त में 
मुझको आकर उपलब्ध हुई 
आँच बस व्यथाओं की ,
जिसको कितने अभाव दहकाते चले गये !
हरसिंगार सबके सब मुरझाते चले गये !!
          अब भी 
          स्मृति है मुझको 
          थे कितने प्यारे क्षण ,
          कितने वे हिले - मिले 
          पर कितने न्यारे क्षण ,
                  जिनमें कुछ ऐसे भी 
                  सहयात्री मिले मुझे -
पहचाने होकर 
जो अनजाने बने रहे ,
अनजाने थे 
पर पहचाने - से भावों को दुहराते चले गये !
हरसिंगार सबके सब मुरझाते चले गये !!
          तब से अब तक 
          बिछुड़ी दमयन्ती - सी सुबहें ,
          साँप - साँप करतीं - सी 
          उफ़ , सामन्ती घामें ,
                  रातों के रंग - राती 
                  बुझे लौह - सी शामें ,
आ - आ कर 
मेरे उस बीते का सुख ढाते चले गये !
हरसिंगार सबके सब मुरझाते चले गये !!
          अब मेरे सम्मुख है 
          नरभक्षी सूनापन ,
          शेष बचा  है केवल 
          टूटा तन ,
          हारा मन ,
                  मेरे सब स्वप्न 
                  अहम् हारे ,
हो नत - मस्तक 
अन्तहीन सीमा को अँधराते चले गये !
हरसिंगार सबके सब मुरझाते चले गये !!


                               - श्रीकृष्ण शर्मा 

( कृपया इसे पढ़ कर अपने विचार अवश्य लिखें | आपके विचारों का स्वागत है| धन्यवाद | )
________________________
पुस्तक - '' एक अक्षर और ''  ,  पृष्ठ - 69 , 70

sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

सुनील कुमार शर्मा 
पी . जी . टी . ( इतिहास ) 
पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
पिन कोड – 326512
फोन नम्बर - 9414771867



                                            


                                           


2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (29-02-2016) को "हम देख-देख ललचाते हैं" (चर्चा अंक-2267) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सार्थक व प्रशंसनीय रचना...
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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