Friday, March 11, 2016

'' अक्षरों पर बन्दिशें हैं '' नामक नवगीत , कवि स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है -










अक्षरों पर बन्दिशें हैं
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       अक्षरों पर बन्दिशें हैं ,
       शब्द पर पहरे ,
       गीत अब किस ठौर ठहरे ?

चुप्पियों का 
एक जंगल है ,
लग रहा 
सब कुछ अमंगल है ,
       सुन न पड़ता कुछ ,
       आवाजें कहीं जाकर 
       गड़ गयीं गहरे। 
       गीत अब किस ठौर ठहरे ?

घुट रही है 
कण्ठ में वाणी ,
किन्तु फूटेगी 
किसी ज्वालामुखी - सी 
पीर कल्याणी ,
       तब न जन के रहेंगे 
       यों दर्द में डूबे हुए 
       ये ज़र्द औ ' ख़ामोश चेहरे। 
       गीत अब किस ठौर ठहरे ?

अक्षरों पर बन्दिशें हैं ,
शब्द पर पहरे। 


                    - श्रीकृष्ण शर्मा 

( कृपया इसे पढ़ कर अपने विचार अवश्य लिखें | आपके विचारों का स्वागत है| धन्यवाद | )
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पुस्तक - '' अँधेरा बढ़ रहा है ''  ,  पृष्ठ - 66 , 67

sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

सुनील कुमार शर्मा 
पी . जी . टी . ( इतिहास ) 
पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
पिन कोड – 326512
फोन नम्बर - 9414771867



5 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (13-03-2016) को "लोग मासूम कलियाँ मसलने लगे" (चर्चा अंक-2280) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. धन्यवाद मयंक जी एवं रश्मि जी कि आपको ये रचना पसंद आई |

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  3. धन्यवाद मनीष जी |

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