Saturday, April 9, 2016

'' वर्षान्त के बिन बरसे बादलों को देख कर '' नामक गीत , कवि श्रीकृष्ण शर्मा के गीत संग्रह - '' फागुन के हस्ताक्षर '' से लिया गया है -








वर्षान्त के बिन बरसे बादलों को देखकर 
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घिरे मेघ कल से , अभी तक न बरसे |


        ये ऐसे निढाल औ ' थके - से पड़े हैं ,
        ज्यों आये हों चल करके लम्बे सफ़र से |
                    
      ये निचिन्त थे , इसलिए सुर्खुरू थे ,
       पड़े साँवले किन्तु अब किस फ़िकर से |

       नहीं बूंद तक गाँठ में स्यात् इनके ,
     दिखावा किये हैं मगर किस कदर से |

     गिरा थाल पूजा का कुंकुम , हरिद्रा ,
     अगरु , धूप , अक्षत - गये सब बिखर - से |   

      ये सूखे हुए रेत पर साँप लहरे ,
      लकीरें बनीं , पर हैं ओझल नज़र से |

     नहीं तृप्ति को दी है आशीष इनने ,
     प्रतीक्षित नयन देखकर ये न हरषे |

घिरे मेघ कल से , अभी तक न बरसे |

                                   - श्रीकृष्ण शर्मा 
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पुस्तक - '' फागुन के हस्ताक्षर ''  , पृष्ठ - 40

sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

सुनील कुमार शर्मा 
पी . जी . टी . ( इतिहास ) 
पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
पिन कोड – 326512
फोन नम्बर - 9414771867

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर ...

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  2. धन्यवाद प्रतिभा जी |

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  3. धन्यवाद प्रतिभा जी |

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (12-04-2016) को "ज़िंदगी की किताब" (चर्चा अंक-2310) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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