Monday, September 7, 2015

पुस्तक ( गीत - संग्रह ) - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गीत --- '' शहर छोड़ आये पीछे ''









हम शहर छोड़ आये पीछे ,
आगे पहाड़ , जंगल व गाँव । 

वह भीड़ - भाड़ वह कोलाहल ,
वह रातों में भी जगर - मगर ;
लेकिन अब गाँव जहाँ पर है ,
बस मौन , मौन का नीरव स्वर ;

शहरी सुविधाओं का न नाम ,
है यहाँ अभावों का मुकाम ;

चाहे खीजैं , चाहे भीजैं ,
चलना ही होगा पाँव -पाँव । 

हम शहर छोड़ आये पीछे ,
आगे पहाड़ , जंगल व गाँव । 


                                     - श्रीकृष्ण शर्मा 

__________________________

पुस्तक - बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 50









sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

Sunday, September 6, 2015

पुस्तक ( गीत - संग्रह ) - बोल मेरे मौन से लिया गीत --- '' पुरबा के संग ''










पुरबा के संग - साथ ,
दौड़ रहे मृगछौने । 

विन्ध्य के शिखर से चल 
घाटी में ये आते ,
जंगल से बस्ती तक 
दल के दल सुस्ताते ;

प्यासे तरु - सरि - प्राणी ,
करने को अगवानी ;

मुँह फाड़े ताक रहे ,
इनका पथ हर कोने । 

पुरबा के संग - साथ ,
दौड़ रहे मृगछौने । 


                         - श्रीकृष्ण शर्मा 

_____________________

पुस्तक - बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 49









sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

Saturday, September 5, 2015

पुस्तक ( गीत - संग्रह ) - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गीत --- '' ढँका बदलियों ने ''









ढँका बदलियों ने उमड़ कर घुमड़ कर ,
मुझे चाँद ने जब निहारा गगन से । 

कोई भावना थी
जो अभिव्यक्ति पाकर 
किसी गीत की 
आज संज्ञा बनी है ,

कोई कामना थी 
जो तुमसे बिछुड़कर
मेरे वास्ते 
आज सन्ध्या बनी है ,

कि पत्थर कहूँ या कहूँ देवता जो ,
न डोला किसी साधना से भजन से ?

ढँका बदलियों ने उमड़ कर घुमड़ कर ,
मुझे चाँद ने जब निहारा गगन से । 


                                              - श्रीकृष्ण शर्मा 

______________________________

पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 48


sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com



Friday, September 4, 2015

पुस्तक ( गीत - संग्रह ) - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गीत --- '' सहज न होता ''









सहज न होता दुख का सहना !!

आँखों में आँसुओं को भरना ,
शूलों को हाथों में गहना !
सहज न होता दुख का सहना !!

जब टूटे मनभावन सपना ,
तब अपने मन को सँभालना ,
कोई मीत राह में छूटे ,
तब उसकी सुधियाँ दुलारना ,

बहुत कठिन होता है सुनना 
चुप रहकर अपनी ही कमियाँ ,

पीकर कड़वे घूँट ज़हर के ,
रस की मीठी बातें कहना !
सहज न होता दुख का सहना !!


                             - श्रीकृष्ण शर्मा 

__________________________
पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 47













Thursday, September 3, 2015

पुस्तक ( गीत - संग्रह ) - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गीत - '' दुख तो दुख है ''









दुख तो दुख है , मेरा हो अथवा तेरा !!

मेरा दुख क्या अलग ,
अलग क्या तेरा दुख ?
दुख की लिपि होती है 
एक , सभी के मुख !

अलग न दुख का दंश ,
दर्द औ ' संवेदन ,
अलग नहीं होता 
आँसुओं का खारीपन !

सच पूछो तो दुख जीवन की थाती है ,
दर्द सभी का , कवि की वाणी गाती है !

ठिठका हूँ मैं , जब - जब पीड़ा ने टेरा !
दुख तो दुख है , मेरा हो अथवा तेरा !! 


                                 - श्रीकृष्ण शर्मा 

_____________________________
पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 46












sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

Wednesday, September 2, 2015

पुस्तक ( गीत - संग्रह ) - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गीत --- '' उसको नमन करें ''









रात के कुरूपा चेहरे पर 
आवरण सुनहरा डाल दिया ,
किसने सूरज को गेंद बना 
इस तम के बीच उछाल दिया ?

पेड़ों के हाथ दिये किसने 
रुमाल अनेकों रंगों के ?
हँसकर किसने ये साँसों का 
दीपक प्राणों में बाल दिया ?

किसने काया को रूप दिया ,
मदिरा दी मादक यौवन को ?
किसने जिन्दगी नाम लिख दी 
लाचार अभागे रज - कण को ?

जो हो , वह कारक का कारक ,
वह है अनादि , अविनाशी है ,
आओ , हम उसको नमन करें ,
जो हर घट - घट का वासी है !


                        - श्रीकृष्ण शर्मा 

_________________________
पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 45












sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

Tuesday, September 1, 2015

पुस्तक ( गीत - संग्रह ) - '' बोल मेरे मौन से लिया गीत - '' क्या ये जग सपना है ? ''









सचमुच क्या ये जग सपना है ?

ये सूरज , ये चंदा - तारे ,
धरती के रंगीन नज़ारे ,
महमह पुष्प , फसल ये लहलह ,
हरहर तरु , ये झरझर धारे ,

ये चरते पशु , उड़ते खग ये ,
ये सड़कें , रेलें , नव मग ये ,
ज्ञान , कला संगीत , वाङ्मय ,
विज्ञानों के बढ़ते पग ये ,

माँ - बापू की वत्सलता ये ,
भ्रातृ - स्नेह , प्रिय कल्पलता ये ,
सुख - दुख , मिलन - विछोह - व्यथा ये ,
त्याग और बलिदान - कथा ये ,

' मैं ' ' तुम ' हैं क्या सिर्फ़ कल्पना ,
क्या असत्य सब ' कुछ ' अपना है ?

सचमुच क्या ये जग सपना है ?


                                 - श्रीकृष्ण शर्मा 

____________________________
पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 44









sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com