Wednesday, October 21, 2015

'' वचन दीप का '' नामक मुक्तक , कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा के मुक्तक - संग्रह - '' चाँद झील में ''से लिया गया है -




वचन दीप का 
                                                              ---------------------


                                      ''  रात को रोशनी की ओढ़नी उढ़ाऊँगा ,
                                 भोर के गाँव तक मैं किरन को पठाऊँगा ,
                                 मेरी छोटी - सी देह देख के 
                                 तुम शक न करो -
                                तुम्हारे हाथों मैं एक सूर्य सौंप जाऊँगा ! ''


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        पुस्तक - '' चाँद झील में ''  ,  पृष्ठ - 11

             
 सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
पिन कोड – 326512
फोन नम्बर - 9414771867

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'' सुबह जगाएँ '' नामक गीत , कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा गीत - संग्रह - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गया है -









सुख छोड़ो , पीड़ाएँ ओढ़ी ,
ये अंधी राहें उजराएँ । । 

हमने तो सपने देखे थे 
मरुथल बन जाए वृन्दावन ,
पतझर के उदास आँगन में 
झूम - झूम कर गाए फागुन ;

गुमसुम होकर हवा न बैठे ,
बन्दी होकर नहीं रोशनी ;

लाल आँच आँखों से जोड़ी ,
किरणें आकर सुबह जगाएँ । 

सुख छोड़ो , पीड़ाएँ ओढ़ी ,
ये अंधी राहें उजराएँ । । 


                                  - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 83

सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
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Monday, October 19, 2015

'' ऐसी आग भरो ! '' नामक गीत , स्व. कवि श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गया है -









कोई ऐसी बात कहो जो हास जगाए , पुलक बिखेरे ! 
कोई ऐसा काम करो जो बंधन चटकें , टूटें घेरे !!

कुम्हलाए उदास चेहरों पर 
है कितनी मायूसी छाई ,
चिन्ताओं ने है ललाट पर 
गहरी वक्र लकीर बनाई ;

गाज गिरी हो ऐसा मन है ,
डसा साँप ने जैसा तन है ,
कोई मरा पड़ा हो ऐसा 
हुआ मातमी घर - आँगन है ;

सब अपने - अपने में खोए 
बीहड़ जंगल सिर पर ढोए ;

कोई ऐसी आग भरो , दुख  - ताप जलें , उजलाय सवेरे !
कोई ऐसी बात कहो जो हास जगाए , पुलक बिखेरे !!


                                                              - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 84

 सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
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Friday, October 16, 2015

'' ओ मेरे कवि '' नामक गीत , कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गया है -









ओ मेरे कवि , चुप मत रहना !!

सब चुप हैं , पर तू सच - सच ही 
सारे जग के सम्मुख कहना !
ओ मेरे कवि , चुप मत रहना !!

अनचाहे संक्रांति काल में 
बेगानी है दृस्टि समय की ,
चारों ओर घिरी हैं गूँगी 
छायाएँ आतंक व भय की ;

बन्धों - प्रतिबन्धों का आलम ,
पटे पड़े जुल्मों के काँलम ; 

शब्द - ब्रह्म की ख़ातिर , आहुति 
बन साधना - यज्ञ में दहना !
ओ मेरे कवि , चुप मत रहना !!


                                          - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 86

सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
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Thursday, October 15, 2015

'' कैसा है ये हवन हमारा ? '' नामक गीत , कवि स्व . श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गया है -









वर्षों बीतीं रात झेलते ,
अँधियारा देह से बेलते ;
धूप खिलाने को दीपक पर ,
हम सूरज से रहे खेलते !

उजियारे को रहे काटते ,
किरणों के पर रहे छाँटते ;
कुछ पल चकाचौंध की ख़ातिर ,
सिर्फ़ कुमकुमें रहे बाँटते !

सम्बन्धों के फूल तोड़ते ,
जलते हुए पहाड़ ओढ़ते ;
चन्द काग़जों की सुर्ख़ी पर 
साँस - साँस को हैं निचोड़ते !

कैसा है यह  सृजन हमारा ,
नागफनी है द्वारे ?
कैसा है ये हवन हमारा 
वर पाकर भी हारे ?


                                   - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 87

सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्रीकृष्ण शर्मा ,
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Wednesday, October 14, 2015

'' गीत लिक्खे हैं ! '' नामक गीत , कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह '' बोल मेरे मौन '' से लिया गया है -









गीत लिक्खे हैं मैंने आँसुओं से पीड़ा के ,
दर्द इस ज़िन्दगी का अक्षरों में ढाला है ,
आँधियों से भरी काली - अँधेरी रातों में 
काँपते हाथों से गीतों का दिया बाला है । 

इनमें बुनता रहा हूँ सपने में भविष्यत् के ,
इनमें देखी गरीब भूख की मैंने रोटी ,
इनमें बेरोज़गार बेटे की मजबूरी है ,
इनमें बीमार बेवा माँ की है किस्मत खोटी । 

देखता हूँ मैं धूप में सिसकती नाकामी ,
किन्तु जिये जा रही है जिन्दगी जहर पीती । 
मुश्किलों , जुल्मों , अभावों में बुझ नहीं पायी ,
एक अरुणाली सुबह राख में अब भी जीती। 


                                                     - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 68

सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्रीकृष्ण शर्मा ,
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Tuesday, October 13, 2015

'' ज़िन्दगी खड़ी है कफ़न ओढ़ ! '' नामक गीत , कवि स्व. श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गया है -









जब दुनिया का दुख देखा तो 
मैं आँसू नहीं रोक पाया !!

मैं अपनी पीड़ा भूल गया ,
मैं भूल गया अपने अभाव ,
हर ठौर पड़े देखे मैंने 
जब भूख - गरीबी के पड़ाव ;

बिखरे सपनों की व्यथा , भग्न 
आशाओं का दारुण विलाप ,
लाचारी औ ' मजबूरी का 
हैं लोग ढो रहे करुण शाप ;

ज़िन्दगी खड़ी है कफ़न ओढ़े,
उखड़ी साँसें , ढहती काया !

जब दुनिया का दुख देखा तो 
मैं आँसू नहीं रोक पाया !!


                                   - श्रीकृष्ण शर्मा 

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पुस्तक - '' बोल मेरे मौन ''  ,  पृष्ठ - 67

सुनील कुमार शर्मा  
पुत्र –  स्व. श्रीकृष्ण शर्मा ,
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